अणु में एक मध्यवर्ती केन्द्र सत्ता होती है, जिसे नाभिक कहते हैं। अणु की शक्ति का स्रोत नाभिक में ही होता है। उसके इर्द- गिर्द उसकी सहायक इकाइयाँ जुड़ी रहती हैं। इस परिवार के सहारे नाभिक को अपनी क्षमता विस्तृत एवं प्रत्यक्ष करने का अवसर मिलता है। अणु- परिवार के भीतर पायी जाने वाली प्रचण्ड सत्ता और क्षमता का यही स्वरूप है।
मनुष्य को एक अणु कहा जा सकता है। नर उसका कलेवर और नारी उसका नाभिक है। उत्पादन की समग्र क्षमता उसी में है। परिपोषण, संरक्षण और अभिवर्धन भी उसी के माध्यम से होता है। यों पूर्ण मनुष्य नर और नारी के दो घटकों के मिलने से ही बनता है, फिर भी यदि दोनों का पृथक विश्लेषण करना पड़े तो वरिष्ठता सहज ही नारी के हिस्से में चली जाएगी।
मनुष्य, जिसमें नर और नारी दोनों ही सम्मिलित हैं, जननी के उदर में से पैदा होता है। वहाँ से कायपिण्ड आवश्यक सामग्री खींच- खसोटकर बढ़ता और जन्म लेने की स्थिति तक पहुँचता है। स्तनपान उसका प्रथम परिपोषण है।
असहाय- अशक्त के लिए अपने बलबूते जीवित रह सकना कठिन है। जीवन देने का ही नहीं, उसके संरक्षण और अभिवर्द्धन का उत्तरदायित्व भी वही उठाती है। स्वभाव और संस्कारों के संचय में मनुष्य जीवनभर में पूरे संसार से जितना पाता है उतना अकेली जननी ही भ्रूण धारण से लेकर पाँच वर्ष तक की आयु में पूरा कर देती है।बड़े बालकों के साथी- सहचर कई प्रकार की क्षमताएँ विकसित करने में सहायता करते हैं, किन्तु बहिन के सहचरत्व से उसे शालीनता, कोमलता, सज्जनता सीखने का अवसर मिलता है। माता के वात्सल्य में पर्वत जैसी ऊँचाई है, किंतु बहिन समानता के स्तर की पवित्रता दे सकने में अनुपम है। भगिनी के माध्यम से भाई को शालीनता संवर्धन में जो योगदान मिलता है, भले ही मूल्यांकन की कसौटी खोटी होने से उसका महत्त्व न समझा जा सके तो भी वस्तुतः है यह अद्भुत ही।
